मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य व्यक्तित्व और सामाजिक उन्नति के लिए प्रयत्न करता है। अपने विचारों से वह स्वयं को, अपने परिवार को, अपने समाज को अपनी जाति को, अपने देश को और सारे विश्व को ही कल्याण के मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास करता है। इतिहास के आरंभ से ही मनुष्य कर्त्तव्य का पालन करता रहा है। समाज में स्वस्थ परंपराएँ ही विशिष्ट संस्कृति को जन्म देती हैं और उसका विकास करती है। किसी देश, जाति अथवा समाज के विचार, वचन, कार्य, आचार, व्यवहार और उनके द्वारा संचालित या संस्थापित परंपराएं ही देश की संस्कृति का निर्माण करती हैं। 'संस्कृति' शब्द का अर्थ है- सफाई, स्वच्छता या सुधार। अर्थात् जो व्यक्ति सही मायने में शुद्ध है, जिसका जीवन परिष्कृत है, जिसके रहन-सहन में कोई दोष नहीं है, जिसका आचार-व्यवहार शुद्ध है, वही सभ्य है और सुसंस्कृत कहा जाएगा। उदाहरण के तौर पर हम देखते है कि प्रकृति में पाई जाने वाली वस्तु, प्रायः साफ नहीं होती, बहुमूल्य हीरे, मोती, मानिक, सोने-चाँदी सभी को शुद्ध करना पड़ता है, उनके कटाई तथा सफाई से ही सौन्दर्य निखरता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी सुसंस्कृत होने से सुन्दर और सुखी बन जाता है। संस्कृति व्यक्ति, समाज और देश के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। संस्कृति से मनुष्य में सद्भावना और सद्गुणों का विकास होता जाता है। संस्कार युक्त होने से मन, शरीर और आत्मा तीनों ही सही दिशाओं में विकसित होते हैं। सस्कृति के चार पहलू हैं- शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्म। संस्कृति का मुख्य उद्देश्य जीवन के इन्हीं चारों पहलुओं को समान रूप से विकसित करना है। भारतीय संस्कृति की विशेषताएं, विचारधाराएं, दर्शन और पौराणिक धरोहर उसे विश्व के सभी देशों से विशिष्ट बनाती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण भारत की पहचान विश्व स्तर तक बनी है। भारतीय संस्कृति की भक्ति, मोक्ष के कई मार्ग बताए गए हैं जो इसकी एक प्रमुख विशेषता है। संस्कृति की दूसरी विशेषता विभिन्न दार्शनिक विचारों की श्रेष्ठता एवं यथार्थ है। कर्मयोग, निष्काम कर्म, अनासक्ति की शिक्षा भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का मूल तत्व है कि अनासक्त रहते हुए मनुष्य को संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। इसी शिक्षा को वेद पुराणों, धर्मग्रंथों एवं शास्त्रों में बताया गया है। जिससे आने वाली पीढ़ियां उनका महत्त्व समझ सकें और उसका पालन करें। भारतीय धर्मशास्त्रों में ऐसी अनेक मान्यताएं हैं जिन्हें प्राचीन मनीषियों ने वैज्ञानिक, सामाजिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक एवं तर्क की कसौटी पर परखा है और उसके महत्व को जनमानस तक पहुंचाया है। भारतीय संस्कृति और उसके मूल्य मान्यताओं पर टिके हैं। हिंदू और भारतीय संस्कृति का आदर्श एवं उदात्त रूप धर्मग्रंथों, वेद-पुराणों एवं संस्कृत महाकाव्यों तथा नीतिगत शास्त्रों में प्रचुर मात्रा में मिलता है जो व्यक्ति को आदर्श जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। संस्कृति किसी देश और जाति की प्रगति, विकास, उत्थान एवं आत्मिक उत्कर्ष का प्रतिबिंब है। संस्कृति युगों-युगों के सर्वांगीण वैचारिक मूल्यों की आत्मा है जिसमें देश व जाति के समग्र उत्थान का ज्ञान होता है।
कहें तो इस पुस्तक के बहाने लोक परम्पराओं लोक के अनुभवों के लोक जन के जीवन और श्रम को मूल्यांकित किया गया है। मानवीय संवेदना के अन्तकरण में भी गहरी पैठ की गई है। पुस्तक में भारतीय संस्कृति का परिचय देते हुये लेखक द्वारा विशद पड़ताल प्रस्तुत की गई है। इस पड़ताल में भारतीय संस्कृति का जो परिचय पुस्तक में दिया गया है वह गौरतलब है। लोक की परम्पराओं समाज के जीवन और उसके श्रम के रूप, लोक गामी चेतना की पक्षधर है। इस पर बात करते हुये पाठकों का ध्यान पुस्तक अपनी ओर आकर्षित करती है। लोक समाज की मान्यताओं पर नये सिरे से सोचने और बहस करने की गुंजाइश पैदा करती है। व्रत और त्योहारों ने हमारे सामाजिक जीवन को बहुत प्रभावित किया है। समरसता का भाव सदा इनमें देखने को मिलता रहा है। पुस्तक में व्रत और त्यौहारों का महत्व बहुत हीसुदंर तरीके से दर्शाया गया है। नैतिक आचार-विचार, पर्व-त्योहार, उत्सव समेत, समाज सम्मत रीति-रिवाजों का चित्रण, संस्कृति पर अब तक लिखी गई पुस्तकों से हटकर लिखा गया है। इनसभी पर यह पुस्तक बहुत अच्छी तरह से विचार प्रस्तुत करती है। भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति के विचारों से भिन्न होती हुई भी अनेक स्तरों पर समान है। लेखिका ने संस्कृति के समानता और असमानता को एक साथ जोड़ने का सराहनीय कार्य किया है। संस्कृति के सभी बिन्दुओं को इस पुस्तक में लेखिका ने विस्तार रूप से चित्रित किया है। पाठक के बीच यह पुस्तक निश्चय ही समादृत होगी। मैं लेखिका इंदु वीरेन्द्रा को 'भारतीय संस्कृति: एक परिदृश्य' पुस्तक के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। साथ ही मैं ये कामना करता हूं कि लेखिका भविष्य में भी अपने लेखन के माध्यम से भारतीय संस्कृति को संरक्षण करने का सराहनीय कार्य करती रहें।
इन्दु वीरेन्द्रा शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), एमफिल. (हिंदी), पीएच. डी. (हिन्दी)। पुस्तकें : हिन्दू धर्मशास्त्र, साठोत्तरी कहानी में परिवार, भारतीय संस्कार, संस्कार हमारी पहचान, विज्ञापनों में प्रयुक्त हिन्दी, चक्रव्यूह, भारतीय आत्मकथाएं संघर्ष और चुनौतियां । संपादन: समकालीन साहित्य के विविध पक्ष, समकालीन साहित्य और समाज, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संपादित पुस्तकों में लेख, शोध आलेख प्रकशित । पुरस्कार सम्मान: भारत सरकार, संसदीय मंत्रालय द्वारा हिन्दी दिवस पर पुरस्कृत भारत सरकार, गृह मंत्रालय (राजभाषा) द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान भारत सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सम्मानित शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सम्मानित राजभाषा भूषण सम्मान मॉरिशस से सम्मानित गुरु नानक देव के पचपनवें प्रकाशोत्सव के अवसर पर (इग्नू, मीरपुर, रेवाड़ी) द्वारा सम्मानित गोपाल राम गहमरी साहित्यकार सम्मानित सम्मान से सम्मानित ओजस्विनी नारी सम्मान, नॉर्वे से सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मुंबई, महाराष्ट्र से सम्मानित बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड, वर्ल्ड एजुकेशन एंड इडीटेक अंतर्राष्ट्रीय प्रेमचंद सम्मान ।
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