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बुजुर्गों की देखभाल: Care of the Elderly

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Specifications
Publisher: Rudra Publication, Delhi
Author Kiran Yadav, Hemlata Pal
Language: Hindi
Pages: 277
Cover: Hardcover
9.0x6.0 Inch
Weight 460 gm
Edition: 2026
ISBN: 9789348963833
BA4084
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Book Description
परिचय

वृद्धावस्था मानव जीवन का एक स्वाभाविक और अनिवार्य चरण है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव माना जाता है। यह केवल आयु का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तनों का एक समग्र अनुभव है। जैसे-जैसे व्यक्ति उम्र के इस चरण में प्रवेश करता है, उसके जीवन की प्राथमिकताएँ, भूमिकाएँ और आवश्यकताएँ बदलने लगती हैं। इस अवस्था में व्यक्ति अपने अतीत के अनुभवों का मूल्यांकन करता है और वर्तमान परिस्थितियों के साथ संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। वृद्धावस्था को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम इसे केवल कमजोरी या निर्भरता के रूप में न देखें, बल्कि इसे जीवन के एक ऐसे चरण के रूप में स्वीकार करें, जिसमें ज्ञान, अनुभव और परिपक्वता का विशेष महत्व होता है। इस संदर्भ में जराचिकित्सा और वृद्धों की देखभाल की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह न केवल वृद्ध व्यक्तियों के स्वास्थ्य और देखभाल से संबंधित है, बल्कि उनके संपूर्ण जीवन की गुणवत्ता को सुधारने का भी प्रयास करती है। जराचिकित्सा, जिसे अंग्रेजी में "Geriatrics" कहा जाता है, चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जो वृद्ध व्यक्तियों के स्वास्थ्य, रोगों और उनकी देखभाल से संबंधित होती है। इसके अंतर्गत वृद्धावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों, रोगों की प्रकृति और उनके उपचार के तरीकों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ ही "Gerontology" अर्थात वृद्धावस्था विज्ञान एक व्यापक क्षेत्र है, जो केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक पहलुओं का भी समावेश होता है। वृद्धों की देखभाल का अर्थ केवल उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना नहीं है, बल्कि इसमें उनकी भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना शामिल है। इस प्रकार, जराचिकित्सा और वृद्धावस्था विज्ञान दोनों मिलकर एक ऐसा समग्र दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो वृद्ध व्यक्तियों के जीवन को अधिक संतुलित और सम्मानजनक बनाने में सहायक होता है। यह आवश्यक है कि समाज में इन अवधारणाओं के प्रति जागरूकता बढ़े, ताकि वृद्ध व्यक्तियों को उचित देखभाल और सम्मान मिल सके। भारत में वृद्धावस्था की स्थिति को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय संदर्भ को जानना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय समाज में वृद्ध व्यक्तियों को अत्यंत सम्मान दिया जाता था और उन्हें परिवार तथा समाज का मार्गदर्शक माना जाता था। संयुक्त परिवार प्रणाली में वृद्धों की देखभाल एक सामूहिक जिम्मेदारी थी, जिससे उन्हें सुरक्षा और समर्थन प्राप्त होता था। हालांकि, आधुनिक समय में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और सामाजिक परिवर्तन के कारण पारिवारिक संरचना में बदलाव आया है, जिससे वृद्धों की स्थिति में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। जनसांख्यिकीय दृष्टि से देखा जाए तो भारत में वृद्ध जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक चुनौती के रूप में उभर रही है। इस बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक सहभागिता से जुड़े मुद्दे भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार, समाज और परिवार मिलकर ऐसे उपाय करें, जो वृद्ध व्यक्तियों के जीवन को सुरक्षित और संतुलित बना सकें।वृद्धावस्था की अवधारणा को केवल आयु के आधार पर परिभाषित करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति पर भी निर्भर करती है। सामान्यतः 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को वृद्ध माना जाता है, लेकिन यह परिभाषा विभिन्न देशों और समाजों में अलग-अलग हो सकती है। इस अवस्था में व्यक्ति को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें शारीरिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएँ, मानसिक तनाव, सामाजिक अलगाव और आर्थिक असुरक्षा प्रमुख हैं। शारीरिक समस्याओं में विभिन्न रोगों का खतरा बढ़ जाता है, जबकि मानसिक समस्याओं में अवसाद, चिंता और स्मृति हास जैसी स्थितियाँ शामिल होती हैं। सामाजिक स्तर पर व्यक्ति को उपेक्षा और अकेलेपन का अनुभव हो सकता है, जबकि आर्थिक स्तर पर आय के स्रोत सीमित हो जाते हैं।

लेखक परिचय

डॉ. किरन बादव एम. ए. (बाल विकास) पीएच-डी. वीर बहादुर विश्व विश्वविद्यालय जौनपुर उत्तर प्रदेश से अपना शोध कार्य पूर्व करने के उपरान्त विभिन्न शिक्षण संस्थानो में अपना अभूत पूर्व योगदान दिया। संम्प्रति सल्तनत बहादुर पी. जी. कालेज, बदलापुर जौनपुर सम्बद्ध वीर बहादुर पूर्वाचल विश्व विद्यालय जौनपुर में गृह विज्ञान विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत है। इनके शोध पत्र अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओ में प्रकाशि हुए है तथा दर्जनो शोध पत्र विभिन्न सेमिनारों में प्रस्तुत हुए है विश्व विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में प्रतिभाग किया। 15 वर्षों से निरन्तर गृह विज्ञान विभागाध्यक्ष के रुप में कार्यरत है।

डॉ. हेमलता पाल पीएच-डी. (बाल विकास) वीर बहादुर सिंह विश्वविद्यालय जौनपुर उत्तर प्रदेश से अपना शोध कार्य पूर्ण करने के उपरान्त श्री विश्वनाथ पी.जी. कॉलेज कलान सुल्तानपुर में गृह विज्ञान विभाग में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत है। इनके शोध पत्र अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं तथा दर्जनों शोध पत्र विभिन्न सेमिनारों में प्रस्तुत हुई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में प्रतिभाग किया। 12 वर्षों से निरन्तर गृहविज्ञान विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत है।

पुस्तक परिचय

वृद्धावस्था मानव जीवन का एक स्वाभाविक और अनिवार्य चरण है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव माना जाता है। यह केवल आयु का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तनों का एक समग्र अनुभव है। जैसे-जैसे व्यक्ति उम्र के इस चरण में प्रवेश करता है, उसके जीवन की प्राथमिकताएँ, भूमिकाएँ और आवश्यकताएँ बदलने लगती हैं। इस अवस्था में व्यक्ति अपने अतीत के अनुभवों का मूल्यांकन करता है और वर्तमान परिस्थितियों के साथ संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। वृद्धावस्था को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम इसे केवल कमजोरी या निर्भरता के रूप में न देखें, बल्कि इसे जीवन के एक ऐसे चरण के रूप में स्वीकार करें, जिसमें ज्ञान, अनुभव और परिपक्वता का विशेष महत्व होता है। इस संदर्भ में जराचिकित्सा और वृद्धों की देखभाल की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह न केवल वृद्ध व्यक्तियों के स्वास्थ्य और देखभाल से संबंधित है, बल्कि उनके संपूर्ण जीवन की गुणवत्ता को सुधारने का भी प्रयास करती है। जराचिकित्सा, जिसे अंग्रेजी में "Geriatrics" कहा जाता है, चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जो वृद्ध व्यक्तियों के स्वास्थ्य, रोगों और उनकी देखभाल से संबंधित होती है। इसके अंतर्गत वृद्धावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों, रोगों की प्रकृति और उनके उपचार के तरीकों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ ही "Gerontology" अर्थात वृद्धावस्था विज्ञान एक व्यापक क्षेत्र है, जो केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक पहलुओं का भी समावेश होता है। वृद्धों की देखभाल का अर्थ केवल उनकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना नहीं है, बल्कि इसमें उनकी भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना शामिल है। इस प्रकार, जराचिकित्सा और वृद्धावस्था विज्ञान दोनों मिलकर एक ऐसा समग्र दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो वृद्ध व्यक्तियों के जीवन को अधिक संतुलित और सम्मानजनक बनाने में सहायक होता है। । यह आवश्यक है कि समाज में इन अवधारणाओं के प्रति जागरूकता बढ़े, ताकि वृद्ध व्यक्तियों को उचित देखभाल और सम्मान मिल सके।

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