पुस्तक परिचय
18 वीं शताबदी में फ्रांसीसी विचारक रूसो ने कहा था- Man is born free but every where he is in chains भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था, "पराधीन सपनेहु सुख नाहीं", दासता एक पीड़ा है, यातना है, अस्तित्व का अंत है। इस पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए तिलक ने नारा दिया था-"स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।" इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए हजारों नर-नारियों ने अपने को कुर्बान कर दिया। उनकी कुर्बानी से नई पीढ़ी को अवगत कराना जरूरी है नाकि वे अपने विरासत को जान-समझ सकें और उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकें। स्वतंत्रता सेनानियों का उद्देश्य, उनकी भावना, उनकी कार्यक्षमता आदि पर विस्तार से चर्चा करना ही स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान है। जरूरत है आनेवाली पीढ़ी अतीत से सबक लेकर अपने भविष्य को सुरक्षित करें और अपनी कुर्बानी देने वाले पूर्वजों को सम्मान दे सकें। स्वतंत्र भारत में फैले भ्रष्टाचार लूटमार, आपसी विद्वेष और दुराचार के अंधेरे को दूर करने के लिये रोशनी की जरूरत है और इसके लिये स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने की जरूरत है।
लेखक परिचय
पिता स्व० राम प्रताप सिंह माता स्व० श्रीमती क्रांति देवी पति श्री भूपेन्द्र सिंह (अवकाश प्राप्त पुलिस पदाधिकारी) शिक्षा स्नातक इतिहास (प्रतिष्ठा) स्नातकोत्तर मानवाधिकार अभिरूचि साहित्य सेवा, समाजसेवा एवं लेखन कार्य पता डॉ० हराधन बसु लेन, भगवान बाजार, छपरा-841301, मो0 9471455897
भूमिका
भूमिका वह पृष्ठभूमि है जिसके माध्यम से हम किसी पात्र को रंगमंच पर प्रस्तुत करते हैं। जब कोई पुस्तक लिखी जाती है तब उस पुस्तक की कथा-वस्तु आदि से पाठक को पूर्वपरिचित कराने के लिये पुस्तक के आरंभ में भूमिका लिखने का प्रचलन है। लेकिन सभी पात्र एक जैसे नहीं होते। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं तब किसी भूमिका की आवश्यकता ही नहीं होती। स्वर्णलता जी उन महान् व्यक्तियों में हैं जो कभी दिवंगत नहीं होते। उनकी यशःकाया अनन्त काल तक लोगों के लिये प्रेरणा का अजस ओत बनी रहती है। 20 जनवरी सन् 1910 को बंगभूमि में उत्पन्न महान् स्वतंत्रता सेनानी दुर्गास्वरूपा श्रीमती स्वर्णलतादेवी की चर्चा के लिये किसी भूमिका की क्या आवश्यकता ? फिर भी ऐसी कोई अनिवार्यता न हाने पर भी औपचारिकता का निर्वाह करते हुये प्रकाशित होने जा रही पुस्तक "स्वतंत्रता सेनानी स्वर्णलता देवीः एक महान् विरासत" की 'भूमिका' के नाम पर चन्द शब्द निवेदित कर रहा हूँ। श्रीमती स्वर्णलता का क्या परिचय दूँ ? शायद इतना कहना ही काफी होगा कि वे मैथिलीशरण गुप्त की 'अबला' नहीं बल्कि सुभादा कुमारी चौहान की वह "मर्दानी" हैं जिन्होंने गुलामी, शोषण, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, छुआछूत एवं अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जीवन पर्यंत लड़ाई की, जीत भी हासिल की लेकिन लाभ के लिये लोभ कभी नहीं किया। अतः अपने बाद वे जो विरासत छोड़ गई है वह किसी भी दृष्टि से सामान्य नहीं है। सनातन संत-मार्ग पर चलने वाले वीतरागी अमृत-पुत्र श्री अभियनाथ चटर्जी की हर सांस में स्वर्णलता जी आज भी जीवित हैं। कहने के लिये 27 अगस्त 1973 को स्वर्णलता जीने चोला जरूर बदल लिया लेकिन हमने कभी उन्हें विस्मृत नहीं किया।
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