पुस्तक परिचय
पुस्तकें हमेशा हमारे लिए उन पथ को सृजित करती हैं जो सुखदायी हों। ऐसी ही पुस्तक गांधीजी ने 1909 में लिखी थी-हिन्द स्वराज। इस पुस्तक के सन्दर्भ में टॉलस्टॉय का कहना था कि यह बहुत उपयोगी पुस्तक है। शताब्दी वर्ष पर कन्हैया त्रिपाठी ने 'हिन्द स्वराज अहिंसक क्रांति का दस्तावेज़' नामक स्वलिखित पुस्तक में गांधीकृत हिन्द स्वराज पुस्तक की विभिन्न कोणों से समीक्षा की है। इसमें लेखक ने शताब्दी वर्ष पर उन पहलुओं पर देखने-समझने का प्रयास किया है जिन संदर्भों में हिन्द स्वराज को देखा जाना चाहिए। अपनी आजादी से बेखबर भारतीय जनता आज गांधी के सुझाए मार्ग को अपना ली होती तो निश्चित रूप से गणतंत्र के 60वें वर्षगांठ पर खुशहाल भारत की तस्वीर पेश होती लेकिन ऐसा नहीं हो सका। 'हिन्द स्वराजः अहिंसक क्रांति का दस्तावेज़' पुस्तक में लेखक ने इसी ओर बार-बार संकेत करते हुए मनुष्य के अपने मौलिक सौन्दर्य के साथ देखने की कोशिश की है। इस तरह शताब्दी वर्ष पर हिन्द स्वराज को केन्द्र में रखकर यह एक दिलचस्प पुस्तक वन सकी है। प्रेम के धर्म को सिखाने वाली पुस्तक 'हिन्द स्वराज' सदी चिंतन को रेखांकित करती है। इस पुस्तक की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका जो मुझे दीखती है वह यह कि इसे हिन्दी भाषा में सृजित किया गया है। हिन्दी जगत के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। भारत की एक बड़ी आबादी इस पुसतक से लाभ प्राप्त करेगी और गांधी के सपनों को अनुप्राणित करने का प्रयास करेगी। लेखक की एक तरह से यह कोशिश है कि हम इस पुस्तक को पूरी निर्भवता के साथ निरपेक्ष समीक्षा प्रकट करें। इसमें यह भी बातें उभरकर आती हैं कि नेहरूवियन मॉडल को हमें आलोचना करने की जगह वर्तमान को कैसे उज्जवल बना सकते हैं इस पर प्रयास हमारे तेज होने चाहिए क्योंकि भविष्य हमारी मुट्ठियों में कैद है। इसलिए भी इस पुस्तक को निश्चय ही एक बार हर पाठक को पढ़ना चाहिए जो हिन्द स्वराज को समझना चाहते हैं और गांधी को आत्मसात करना चाहते हैं।
लेखक परिचय
जन्म : 01 जनवरी 1981 आजमगढ़ (उ.प्र) शिक्षा: एम.ए. अहिंसा एवं शांति अध्ययन (गोल्ड मेडलिस्ट), एम.फिल, अहिंसा एवं शांति अध्ययन (गोल्ड मेडलिस्ट), पी-एच. डी. महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा से तथा राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण। अध्यापन कार्य महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में सत्र 2006-08 के दौरान अतिथि प्राध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य। प्रकाशित कृतियाँ 'सतह से शिखर तक भारत के राष्ट्रपति' (2004), 'आदिवासी समाज और मानवाधिकार', (Indigenous Peoples and Human Rights (2009)) हिन्द स्वराज : शताब्दी विमर्श (2010) Hind Swaraj: A Charter for Human Development from Within (2010) सदी की विश्व चुनौति - एड्स (राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान, मैरीलैण्ड, अमेरिका से प्रकाशनाधीन), विश्व आंतकवाद और शांति (प्रकाशनाधीन)। कुरुक्षेत्र, योजना, वर्तमान साहित्य, परिकथा, फिलहाल, स्वाधीनता गजट, ग्रामीण भारत मानवाधिकार नई दिशाएं आदि पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित । वृत्तचित्र का निर्देशन: अ डाक्यूमेण्ट्री ऑन सुसाइड ऑफ पीजेण्ट इन विदर्भाः 'तमस' का निर्देशन ।
भूमिका
साहित्य का लक्ष्य संसार का कल्याण करना है- 'विश्वश्रेयः काव्यम्' । सच्चा साहित्य तो वही है जो आध्यात्मिक स्वप्नों और मनुष्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित करे। हिन्द स्वराज प्रथमतः एक साहित्यिक कृति के रूप में देखी जानी चाहिए, जिसका उद्देश्य ही जहाँ तक मैंने अनुभव किया है-आध्यात्मिक स्वप्न जागृत करने के लिए है और मनुष्य का इन स्वप्नों से तादात्म्य बनाने का भी है। दर्शन के जानकारों का यह मानना रहा है कि मानव जीवन की सफलता इस बात में है कि उसके स्वभाव के विभिन्न पक्षों-शरीर, मन तथा आत्मा का सुसम्बद्ध विकास हो। केवल शारीरिक उन्नति अथवा बौद्धिक तत्परता ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य के प्रयासों का लक्ष्य आत्मिक साक्षात्कार होना चाहिए। हिन्द स्वराज में इसका पुरजोर समर्थन है। गांधीजी ने सन् 1909 में जब किलडोनन केस्टल जहाज पर लन्दन से दक्षिण अफ्रीका वापसी के दौरान हिन्द स्वराज का सृजन किया तो उसमें वह 'आत्म' से साक्षात्कार पर ही बल दिए। हिन्द स्वराज इस तरह से एक ऐसी कृति के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत है जिसकी पूर्वपीठिका दार्शनिक दृष्टि से भी 'आध्यात्मिक' व 'आत्म' की ओर हमारा ध्यान खींचती है। वस्तुतः यह पुस्तक इस तरह रची गयी कि इसका उद्देश्य स्पष्ट था। बेन जान्सन ने उत्तम लेखन के लिए कुछ सिद्धांत दिया है। उनका मानना था कि अच्छे लेखक के कुछ गुण होते हैं, जिनका अनुकरण करने पर अच्छा लेखन हो पाता है।
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