काव्य-संग्रह एक अमूल्य उपहार है, जो भावनाओं को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। मधुरेश मिश्रा जी का प्रथम काव्य संग्रह 'जाने-अनजाने पदचिह्न' इस दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें कवि ने जीवन के विभिन्न पहलुओं को कविताओं के माध्यम से संजोया है। इस संग्रह में पाठकों को कवि का जहां जुझारू और प्रेरणादायक व्यक्तित्व देखने को मिलता है, वहीं संवेदनशील दृष्टि, गहन चिंतन और अनुभवों की गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इस काव्य संग्रह की शुरुवात पदचिह्न नामक प्रेरक कविता से होती है, जिसकी कुछ पंक्तियों इस तरह हैं-
किसी के पदचिह्नों पर न चल,
बना के खुद पदचिह्न आगे तू बढ़।
किसी के इतिहास के पन्ने न पलट,
स्वयं भविष्य का इतिहास तू गढ़।
'पदचिह्न' यहाँ उन कदमों का प्रतीक है, जिन्हें व्यक्ति स्वयं चुनता है और जो दूसरों के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं। संदेश साफ़ है- हमें दूसरों के पदचिह्नों का अनुसरण करने के बजाय, अपनी दिशा खुद तय करनी चाहिए और कुछ नया करने की कोशिश करनी चाहिए। 'पदचिह्न' कविता आत्मनिर्भरता का आह्वान करती है, जो हर पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।
यह पुस्तक पाँच मुख्य खंडों में विभाजित है, जिनमें कवि ने जीवन के विविध अनुभवों को भावनात्मक और सार्थक रूप में प्रस्तुत किया है।
पहले खंड, प्रेरणा, संघर्ष और सफलता, में कवि ने जीवन के उस दौर की बात की है जहाँ कठिनाइयाँ व्यक्ति को तराशती हैं और सफलता के शिखर तक पहुँचाती हैं। कविता 'कार्य ही विश्राम' की अग्रलिखित पंक्तियाँ जीवन में अनवरत कार्य करते रहने की प्रेरणा देती हैं -
जब कार्य ही विश्राम हो,
और गति ही आराम हो।
श्री राम जैसा संघर्ष हो,
श्री कृष्ण जैसा विमर्श हो।
राम जैसा संघर्ष और कृष्ण जैसा विमर्श पंक्तियों का तात्पर्य है कि कठिनाइयों का सामना धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा से किया जाए, साथ ही विवेक और शौर्य से निर्णय लेने की प्रेरणा मिले।
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