प्रस्तुत पुस्तक का शीर्षक महात्वागांधी का धर्म-दर्शन है। इसमें मैंने महात्मा गाँधी के धर्म-दर्शन की सुव्यवस्थित, तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की है। आलोचनात्मक व्याख्या का संकुचित अर्थ मात्र बालोचना हो सकता है, किन्तु दार्जनिक पृष्ठभूमि में किसी भी सिद्धान्त की सही-सही व्याख्या, उसकी तुलनात्मक विवेचना एवं उसका सही मूल्यांकन करना आलोचनात्मक अध्ययन कहा जा सकता है। यहाँ विस्तृत अर्थ में आलोचना शब्द का प्रयोग किया गया है। प्लेटो की तरह महात्मा गाँधी के विचार भी विविध स्थलों पर बिखरे हुए हैं। बुद्ध और सुकरात, ईसामसीह और गाँधी ने दर्शन को लिखा नहीं, बल्कि दर्शन को जीवन में प्रयुक्त किया। उनके प्रशंसकों का कार्य यह है कि उनके दर्शन को व्यवस्थित करें और उसकी विवेचना करें। गाँधी ने कोई भी दर्शन की पुस्तक नहीं लिखी, बल्कि धार्मिक सिद्धान्त उनकी जीवन-गाथा, उनके भाषणों में उनके लेखों में भरे पड़ड़े हैं। मैंने उन सब का अध्ययन करके महात्मा गाँधी के धर्म-दर्शन को एक व्यवस्थित रूप दिया है। वर्तमान युग की यह विशेषता है कि मानव अत्यधिक बौद्धिक हो गया है। जो धर्म या धर्म-दर्शन बुद्धि को ग्राह्य नहीं है, उसे आधुनिक युग का मानव स्वीकार नहीं करता। इस कारण मैंने ऐसा विचार किया कि महात्मा गाँधी की धार्मिक अनुभूतियों एवं नैतिक सत्यों की बौद्धिक विवेचना की जाये। आधुनिक दर्शन में बुद्धि का प्रमुख स्थान है। तर्क की कसौटी पर सभी सत्यों को कसा जाता है और जो बुद्धि की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, उसे दार्शनिक अग्राह्य बतलाते हैं, इस कारण मैंने आलोचनात्मक बिधि का प्रयोग किया है तथा उनके धर्म-दर्शन को वृद्धि सम्मत् एवं तर्कसम्मत रूप दिया है। दूसरी बात है कि मैंने गाँधी के धर्म-दर्शन में तुलनात्मक विधि का प्रयोग किया है। महात्मा गांधी के धर्म-दर्शन के सम्बन्ध में तुलनात्मक विधि अत्यन्त ही उपयोगी प्रतीत हुई। महात्मा गाँधी का धर्म विश्व के अन्य धर्मों से प्रभावित है। ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म, बौद्ध धर्म आदि की स्पष्ट छाप उनके धर्म पर परिलक्षित होती है। यहाँ पर आवश्यकतानुसार मैंने प्राचीन एवं अर्वाचीन पश्चिमी तथा पूर्वी धार्मिक तथ्यों की तुलनात्मक विवेचना की है। पूर्वी विचारों की पश्चिमी विचारों से तुलना महात्मा गाँधी के धर्म-वर्शन के लिए आवश्यक है। तुलनात्मक अध्ययन इस कारण भी उपयोगी प्रतीत होता है कि समी धर्म आंशिक सत्य को प्रस्तुत करते हैं और ईश्वर पूर्ण एवं एक है, जिसे निम्न-भिन्न धर्मवेत्तानों ने भिन्न-भिन्न रूप दिया है। महात्मा गाँधी इस बात को स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि सभी धर्म एक ही सत्य की ओर इंगित करते हैं । इस पुस्तक को मैंने छः परिच्छेदों में विभाजित किया है। पहला बरिच्छेद भूमिका है। इसमें गाँधी के जीवन, व्यक्तित्व, उनके दर्शन का विकास एवं भारतीय स्रोत तथा पश्चिमी स्रोत को बताने की चेष्टा की गयी है। गाँधी के धर्म-दर्शन के तथ्यों को उपनिषद् भगवद्गीता, बौद्ध, जैन धर्म जैसे भारतीय स्रोतों से जोड़ने की चेष्टा की है। पुनः गाँधी के विचारों की थोरो, रस्किन, टाल्सटाय, ईसाई धर्म तथा इस्लाम धर्म से भी तुलना की गयी है। दूसरे परिच्छेद में मैंने धर्म-दर्शन क्या है, धर्म-दर्शन का इतिहास, धर्म दर्शन और ईश्वर शास्त्र के सम्वन्धों को तथा धर्म और दर्शन के भेद को बताने का प्रयास किया है। तीसरे परिच्छेद में धर्म का स्वरूप, धर्म की उत्पत्ति एवं विकास, धर्म की परिभाषाएँ एवं गाँधी का धर्म-विचार प्रस्तुत किया है। पुनः धार्मिक मनुष्य का स्वरूप बुद्धि एवं श्रद्धा का सम्बन्ध, महात्मा गांधी का नैतिक धर्म एवं उनकी धार्मिक अनुभूति की भी विवेचना की गयी है। चौथे परिच्छेद में ईश्वर का स्वरूप क्या है ? ईश्वर की सत्ता के प्रमाण, क्या ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण है ? ईश्वर और मानव, ईश्वर और विश्व, प्रार्थना की उपयोगिता, ईश्वर को पाने के साधन एवं रामनाम की उपयोगिता की चर्चा की गयी है। पांचवें परिच्छेद में चरम सत्ता, सत्य का स्वरूप, सत्य ही ईश्वर है-इन समस्याओं का अध्ययन किया गया है। छठवें परिच्छेद में आत्मा के स्वरूप की विवेचना की गयी है। आत्मा और ईश्वर देह और आत्मा के सम्बन्ध को बतलाया गया है, संकल्प स्वातन्त्र्य अशुभ विचार कर्म सिद्धान्त, आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म, मोक्ष जैसी समस्याओं पर विस्तृत विचार किया है। तत्पश्चात् निष्कर्ष है
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