विजय कुमार निश्चल समकालीन हिंदी-संस्कृत साहित्य और शिक्षा-जगत के एक सशक्त एवं प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। शिक्षा के प्रति निष्ठा, भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था और सतत साहित्य-साधना ने उन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान की है। वर्तमान मैं वे दिल्ली शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत टीजीटी संस्कृत के पद पर कार्यरत हैं। स्वर्गीय पिता श्री गोपाल दास निश्चल एवं माता श्रीमती विद्या देवी जी को नमन अर्पित करते हुए, विजय कुमार निश्चल साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। शैक्षणिक योग्यताएँ- बी.ए. (ऑनर्स) शास्त्री, आश्रम हरि मंदिर संस्कृत महाविद्यालय पटौदी (MDU Rohtak) प्रथम श्रेणी बी.एड. (प्रथम श्रेणी) राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली एम.ए. संस्कृत (प्रथम श्रेणी) (MDU रोहतक) एम.ए. हिंदी (प्रथम श्रेणी) (IGNOU) एम.ए. एजुकेशन (IGNOU) प्रथम श्रेणी (डिस्टिंक्शन) UGC-NET (संस्कृत एवं शिक्षा) प्रमुख रचनाएँ (प्रकाशित कृतियाँ) अनामिका (संस्कृत नाटक), अभिज्ञान शकुंतलम् एवं मेघदूत (काव्यानुवाद), अनुपम बाल कहानियाँ, मुसाफिर एवं अस्मिता (कहानी संग्रह), मधुर स्पर्श (कविता संग्रह), वाल्मीकि रामायण में करुण रस की प्रधानता (शोधात्मक कृति), My Pearl (English Poems), हिंदी व्याकरण, धर्मोपदेश (अनमोल वचन), न्याय (संस्कृत लघु कथा), मसीहा (कहानी संग्रह), अमर चरित मानस (महाकाव्य) हरियाणा साहित्य अकादमी से अनुदान प्राप्त । सम्मान - संस्कृत समाराधक सम्मान संस्कृत साहित्य अकादमी, दिल्ली संस्कृत सेवा सम्मान - संस्कृत साहित्य अकादमी, दिल्ल संस्कृत शिक्षक रत्न सम्मान- संस्कृत शिक्षक संघ, दिल्ली कहानी, कविता, नाटक, महाकाव्य, अनुवाद
बाल साहित्य किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का आधार होता है। जिस प्रकार एक वृक्ष की सुदृढ़ता उसके बीज और जड़ों पर निर्भर करती है, उसी प्रकार किसी समाज का भविष्य उसके बच्चों के संस्कार, शिक्षा और नैतिक मूल्यों पर आधारित होता है। बालक जन्म से न तो अच्छा होता है और न बुरा उसका व्यक्तित्व उसके परिवेश, शिक्षा तथा साहित्य से निर्मित होता है। इसलिए बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास और मानवीय मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम है। श्रेष्ठ बाल साहित्य बालक के भीतर सत्य, करुणा, प्रेम, परिश्रम, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता जैसे गुणों का विकास करता है। यही कारण है कि प्रत्येक युग में बाल साहित्य को विशेष महत्त्व दिया गया है।
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