भूमिका
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत यह संकलन "घूमते-फिरते" विविध विषयों पर रचित कविताओं का संग्रह है। इस शीर्षक के पीछे वही भाव है, जो जीवन की निरंतर गति और अनवरत चलने वाली यात्रा में छिपा हुआ है। मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, जो-जो देखता और अनुभव करता है, वही उसकी संवेदनाओं को रूप देता है और वही संवेदनाएँ कविता का रूप लेकर इस संग्रह में सजीव हो उठी हैं।
यह पुस्तक किसी एक विषय या धारा से बंधी हुई नहीं है। इसमें प्रकृति की छवियाँ भी हैं और समाज की सच्चाइयाँ भी। इसमें मानवीय रिश्तों की ऊष्मा है तो जीवन की विडंबनाओं का चित्रण भी। कहीं यह कविताएँ हँसाती हैं, कहीं सोचने पर विवश करती हैं और कहीं गहन आत्मानुभूति की ओर ले जाती हैं। जैसे जीवन की राहें अनेक दिशाओं में घूमती-फिरती हैं, वैसे ही इन कविताओं के विषय और भाव भी अलग-अलग रंगों में प्रस्तुत हुए हैं।
"घूमते-फिरते" शीर्षक यह संकेत देता है कि कवि की दृष्टि स्थिर नहीं, वह निरंतर गतिशील है। वह समाज, संस्कृति, प्रकृति और समय की धारा के बीच घूमता फिरता हुआ हर दृश्य और हर अनुभव को अपने शब्दों में ढालता है। यही कारण है कि इस संग्रह की कविताएँ न केवल व्यक्तिगत भावनाओं का परिचय देती हैं, बल्कि सामूहिक जीवन के विविध पक्षों को भी उद्घाटित करती हैं।
इन कविताओं की रचना एक सुनियोजित प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के अनायास अनुभवों की उपज है। "घूमते-फिरते" क्षणों में, कभी यात्रा के दौरान, कभी किसी सहज दृश्य को देखकर, कभी स्मृतियों की गहराई में डूबकर और कभी समाज की ज्वलंत समस्याओं से टकराकर ये पंक्तियाँ जन्म लेती रहीं। इन पंक्तियों में कहीं बचपन के दिनों की मासूम यादें हैं, तो कहीं युवावस्था की बेचैनियाँ और जीवन के संघर्षों की गूँज भी हैं।
लेखन की यह यात्रा मेरे लिए आत्मसंवाद का माध्यम भी रही है। जब-जब शब्दों ने भाव का रूप लिया, तब-तब ऐसा लगा मानो मन का बोझ हल्का हो गया हो। कभी कविताएँ आत्मचिंतन की संगिनी बनीं, तो कभी पाठकों और श्रोताओं से संवाद का सेतु। यही यात्रा धीरे-धीरे इस संकलन के रूप में साकार हुई।
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