पुस्तक परिचय
मेरे ये लेख अपने समय की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इन पत्रिकाओं में परोपकारी, मधुमती, पंजाब सौरभ, नवनीत, आजकल, समकालीन जनमत, नारी संवाद, पश्यन्ती, वागार्थ, न्यायचक्र, नया मानदण्ड, अपेक्षा, आदि के साथ ही कुछ लेख पुस्तकों में भी सम्मलित किए गए। इन लेखों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये लेख हिन्दी साहित्य में उभरती हुयी प्रवृत्तियाँ के एकदम प्रारम्भ में लिखे गए। जैसे ग़ज़ल, लघुकथा या दलित साहित्य ! ये प्रवृतियां अब पूरी तरह पुष्ट और स्थापित हो गई है। इसलिए इन लेखों का ऐतिहासिक महत्व भी है। मैंने कुछ साहित्यिक व्यक्तित्वों, कृतियों एवं प्रकृतियों को समझने के लिए पढ़ना प्रारम्भ किया और नोट्स के रूप में धीरे-धीरे लिखना प्रारम्भ किया। मित्रों के आग्रह पर इन्हें पत्र-पत्रिकाओं को भेजने लगा। छपने लगे तो मैं प्रोत्साहित होने लगा। उन्हीं लेखों में से मैंने इनका चयन किया है। मेरे ये लेख इस बात की गवाही अवश्य देंगे कि मेरा वैचारिक विकास अपने प्रारम्भ से ही एक अलग दिशा में हो रहा था। जिसके कारण मैं अन्ततः दलित साहित्य पर आकर ठहर गया। मैं प्रारम्भ से ही कविता लिखता रहा हूँ। लेकिन समाचार पत्रों से जुड़े होने के कारण मैं कभी किसी साहित्यिक या सामाजिक व्यक्तित्वों का साक्षात्कार लेकर या फिर कोई परिचर्चा आयोजित कर प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए रखने का प्रयास करता रहता था। इसमें पद्मश्री कन्हैयालाल मिश्र के साक्षात्कार का एक अंश भी है और सरस गीतकार पद्मश्री 'नीरज' का तो ग़ज़ल पर एक सम्पूर्ण साक्षात्कार ही है। और भी कई साहित्यकारों जैसे शायर नवाज देवबन्दी तथा हिन्दी के खलील जिब्रान आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र आदि के साक्षात्कार भी इस पुस्तक में संकलित है। कुछ संस्मरणात्मक लेख भी इसमें है-जब मेरे लेखों का पहला संकलन 'विचार यात्रा में' सन्-1998 में प्रकाशित हुआ तो उसका अवलोकन कर पद्मश्री चिरंजीत ने अपना मन्तव्य इस प्रकार व्यक्त किया। 'आपकी पुस्तक 'विचार यात्रा में' अच्छी लगी। इससे आप हिन्दी साहित्य के एक विद्धान, गम्भीर चिन्तक तथा समाजशास्त्र के विशेषज्ञ के रूप में उभरे हैं। अपने इसी रूप को और संवारिये, उभारिये हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों में अपना विशिष्ट स्थान बनाइए।" मैं समझता हूँ कि मुद्दों पर गहन चिन्तन और उसके सामाजिक प्रभाव का अध्ययन प्रारम्भ से ही मेरी प्रवृत्तियों में रहा है। इसकी झलक भी मेरे इन लेखों में देखने को मिलेगी। इन लेखों के लेखनकाल में एक लम्बा अन्तराल है। अतः शैलीगत विविधता भी सम्भवतः हो। फिर भी जो है, जैसा है, आपके सम्मुख है। आपकी प्रतिक्रिया मेरी भविष्य यात्रा का संबल होगी।
लेखक परिचय
जन्म: 1 जनवरी, 1956 जन्म-स्वानः ग्राम चतरसाली, जनपद सहारनपुर (उ.प्र.) शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी) पी-एच.डी. (1980), डी.लिट्. (2007) प्रकाशित कृतियाँ: 1. सन्त कवि रैदास मूल्यांकन और प्रदेय,2. सतह से उठते हुए, 3. विचार यात्रा में, 4. मेरा दलित चिन्तन, 5. कठौती में गंगा, 6. आचार्य पद्मसिंह शर्मा और हिन्दी आलोचना, 7. व्यक्ति और विमर्श, 8. सम्पुट, 9. दर्द के दस्तावेज, 10. यातना की परछाइयाँ, 11. काले हाशिए पर, 12. चेतना के स्वर, 13. शिखर की ओर, 14. दलित साहित्य चिन्तन के विविध आयाम, 15. दलित साहित्य और युगबोध, 16. रैदास ग्रंथावली, 17. दृष्टिपथ के पड़ाव, 18. दलित साहित्य: परम्परा और विन्यास, 19. सुश्री मायावती और दलित चिन्तन, 20. दलित साहित्य के प्रतिमान, 21. अंधेरों के विरुद्ध, 22. संभल राजपथ वरना...., 23. शब्बीरपुर जलते घर-सुलगते सवाल, 24. दलित चिन्तन : अनुभव और विचार, 25. संत शिरोमणि रैदास वाणी और विचार, 26. दलित साहित्य और राजनीति, 27. दलित साहित्य और समाज । विशेष : 1. 'सुमनलिपि' (मासिक) मुम्बई के 'दलित साहित्य अंक' नवम्बर 1995 का अतिथि सम्पादन, 2. 'दर्द के दस्तावेज' का मराठी में अनुवाद तथा 'सतह से उठते हुए' का उर्दू में अनुवाद प्रकाशित, 3. कुछ कविताओं का असमिया, तेलगू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, संस्कृत तथा अंग्रेजी में अनुवाद, 4. आकाशवाणी नजीबाबाद से वार्ताओं का प्रसारण, 5. कई विश्वविद्यालयों में व्यक्तित्व एवं साहित्य पर पी एच.डी. एवं एम. फिल्. स्तरीय शोध सम्पन्न। शब्द-शब्द संघर्ष (अभिनन्दन ग्रंथ) प्रकाशित । सम्मान: 1. 'डा. अम्बेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान' 1995, 2. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, का सर्जना पुरस्कार-1998, 3. मध्यप्रदेश दलित साहित्य आकदमी, उज्जैन का 'अकादमी पुरस्कार' 1999, 4. भारतीय दलित साहित्य अकादमी, भोपाल
मेरी ओर से
मेरे 46 लेखों का यह संग्रह आपके सम्मुख हैं। इसमें मेरे प्रारम्भिक लेखों से लेकर अद्यतन लेख सम्मिलित हैं। ये लेख जब लिखे गए थे, उसी समय अपने समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे, और चर्चित भी हुए थे। मुझे याद पड़ता है कि जब मेरा लेख में दुष्यत कुमार : एक विद्रोही गजलकार मधुमती (मासिक) में मार्च-1980 अंक में प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक डॉ. प्रेमचन्द विजयवर्गीय थे। डॉ. विजयवर्गीय वनस्थली विद्यापीठ, में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे। जब मैं एक दिन उनके निवास स्थान पर उनसे मिलने गया और मैंने उनकी डोर बैल बजाई ! उन्होंने दरवाजा खोला और पूछा-कौन? मैंने विनम्रता से कहा- मैं डॉ. एन. सिंह, सहारनपुर से! उन्होंने बहुत हताशा के भाव से कहा- "अरे! आओ भाई! आपकी वजह से हमारी नौकरी चली गई थी।" मैं हतप्रभ ! मुझे अन्दर जाना मुश्किल हो गया। लेकिन इतनी दूर से आया था। तो किसी तरह अन्दर गया और पानी पीकर जब व्यवस्थित हुआ तो संसंकोच पूछने सर आपकी नौकरी! तो उन्होंने बताया कि मधुमती के सम्पादन के लिए, विद्वानों को छः छः महीने के लिए सरकार नियुक्त करती है। और मैंने आपका 'दुष्यंत' पर लेख छापा था। जो सरकार को लगा कि एमरजेन्सी के विरोध में था। इसीलिए सरकार ने मुझे दो माह पहले ही मधुमती के सम्पादन से हटा दिया था। खैर ! उसके बाद सौहार्दपूर्ण वातावरण में उनसे बातचीत होती रही और चाय पीकर में लौट आया। लेकिन मुझे अपने लेखन की ताकत का एहसास हो गया। मेरे इसी प्रकार के लेखों का यह संग्रह है, जिन्होनें मुझे लेखक होने का बोध कराया।
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