साहित्यिक मानदंडों के तहत किसी विधा का नाम जो भी हो, उसका कथानक तो एक अफसाना ही होता है। लेखक की सोच, कल्पना और अनुभवों से रचा अफसाना। इस पुस्तक की हर रचना में भी आपको इन्हीं अफसानों के बिंब मिलेंगे पर विधाएँ भिन्न। सर्वज्ञात है कि साहित्यिक विधाओं की श्रेणियाँ अस्पष्ट होती जा रही हैं। बिना किसी निश्चित सीमा या परिभाषा के कारण। खासकर आज के माहौल में, जहाँ किसी न किसी 'नयी विधा' का जनक बनने की होड़-सी लगी है। मेरे लिए तो लेखन में अब भी वही 'ढाई आखर प्रेम के' प्रधान हैं, जिनसे समाज का संवर्धन हो। बाकी तो सब 'धोथ' । बहुत संभव है कि निकट भविष्य में तमाम नवीनतम विधाओं के मानक-पैमाने इतने घुल-मिल जायें कि उनका स्वतंत्र रूप पहचानने में स्वयं साहित्यिक पंडितों की बुद्धि जवाब दे जाए और उन्हें 'नकली मेधा (ए आई)' खंगालनी पड़े। इसलिए इस पुस्तक में मैंने इरादतन 'पारंपरिक विधाओं' को ही अंकित किया है, जो अपने-आप में निर्विवाद हैं। मेरा निवेदन है युवा हिंदी-प्रेमियों से, कि आप संवेदनशील व मननशील बनें और नकली मेधा को दर किनारे कर साहित्य सृजन करें। हाँ, आलोचनाएँ फिर भी होंगी, खूब होंगी, पर आपको संयम बरतना होगा ताकि कलम चलती रहे।
सविता मनचंदा (विवाहोपरांत) सविता ओबेरॉय (विवाहपूर्व) जन्मस्थान : बंबई, महाराष्ट्र, भारत शिक्षा: बी ए (एस एन डी. टी. विश्वविद्यालय) एम ए, बी एड् (बंबई विश्वविद्यालय) कार्यक्षेत्र व शौक (1) लेखन, पत्रकारिता व मॉडलिंग उपसंपादक 'धर्मयुग', सह संपादक 'शिक', अनुवाद कार्य। (2) कार्यक्रम संचालन (एँकरिंग), अभिनय, नाट्य निर्देशन, व डबिंग ऑल इंडिया रेडियो, बंबई दूरदर्शन, एस एन डी टी विश्वविद्यालय, बंबई विश्वविद्यालय, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र और परमाणु ऊर्जा शिक्षण संस्थान के तत्वावधान में। (3) अध्यापन व प्रबंधन परमाणु ऊर्जा शिक्षण संस्थान (सेवा निवृत)।
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