ये सुंदर, रसपूर्ण कहानियाँ प्रकृति-प्रेम और पर्यावरण की आज की दुनिया प्रकृति से दूर होती जा रही है। इसीलिए मनुष्य के जीवन में एक के बाद एक नए-नए संकट आ रहे हैं। खासकर पर्यावरण तो आज का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सच तो यह है कि अगर हमें अपने आपको बचाना है और इस धरती को नष्ट होने से बचाना है, तो हमें प्रकृति और पर्यावरण के बारे में सोचना ही पड़ेगा। प्रकृति माँ है। उसने हमें एक से एक अनमोल उपहार दिए, पर स्वार्थ में अंधे होकर हम उन्हें भूल गए। भूलते ही चले गए। यह मनुष्य का दुर्भाग्य है। पर आज फिर से हमें इस बारे में सोचना होगा। सचेत होना होगा, और दूसरों को भी करना होगा। अगर हमें अपने आप को बचाना है, तो हमें इस धरती के जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और पेड़-पौधों को भी बचाना होगा। कारण यह है कि इस सृष्टि में कोई अकेला नहीं है। सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक-दूसरे के सहारे ही हमारे विकास की कहानी आगे चलती है। वरना हमारा अस्तित्व बचेगा नहीं। अगर पेड़-पौधे और जीव-जंतु नहीं रहेंगे, तो मनुष्य भी नहीं बच पाएगा। सबका अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। सबके तार एक-दूसरे से जुड़े हैं। आज से नहीं, हजारों बरसों से। आधुनिकता की दौड़ में हम इसे भूल गए। इसीलिए इतनी सारी आफतें हमारे जीवन में आईं। हमारी लोक-परंपराओं में यह बात बार-बार आती है कि पेड़ हमारे पुरखे हैं। उनके बिना हम जीने की कल्पना ही नहीं कर सकते। जबकि आज हम बेरहमी से जंगल काटते जा रहे हैं। यह तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना हुआ न। इसलिए हमारी सरकार ही नहीं, पूरी दुनिया के लोग और सरकारें बहुत गंभीर होकर इस बारे में सोच रही हैं। एक मुश्किल यह है कि आज हम विकास की जिस अंधी दौड़ में शामिल हैं, उसमें प्रकृति के साधनों का रात-दिन अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। ऐसे में नदियाँ नालों में बदल गई हैं और पहाड़ हों या जंगल, हर जगह तबाही दस्तक दे रही है। यह कितने दुर्भाग्य की बात है। इसलिए आम लोग भी अब फिर से प्रकृति के निकट जाने की बात कर रहे हैं। यहाँ तक कि बच्चों में भी अब प्रकृति और पर्यावरण को बचाने की चेतना आ रही है। यह एक शुभ संकेत है। यों हमारे यहाँ तो शुरू से ही प्रकृति को लेकर प्रेम और आदर का भाव रहा है। नदियाँ हों या पेड़, सबकी यहाँ पूजा होती है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता रहा है कि शाम होने पर पेड़ों के पत्ते नहीं तोड़ने, क्योंकि पेड़ सो रहे हैं। इसी आधार पर महान वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने साबित किया कि पेड़-पौधों में भी जीवन है। आश्चर्य, जिस समय उन्होंने अपना यह सिद्धांत प्रस्तुत किया, उनकी हँसी उड़ाने वाले बहुत लोग थे। पर आज सारी दुनिया मान रही है कि जगदीशचंद्र बसु ने जीवन और प्रकृति की एक बड़ी सच्चाई को वैज्ञानिक जगत के सामने रखा। हमारे प्राचीन ग्रंथ और लोक परंपराएँ हजारों बरसों से यही बात कहती आई हैं। आज हमें इन बातों को अपने जीवन में अपनाना होगा। 'घुमक्कड़राम ने सुनाए किस्से' पुस्तक को लिखते समय मैंने कोशिश की है कि बच्चों को कहानियों के माध्यम से रोचक ढंग से पर्यावरण को बचाने की सीख दी जाए। इसलिए बच्चों को यहाँ सिर्फ दिलचस्प कहानियाँ ही नहीं, बल्कि बड़े मजेदार पात्र भी नजर आएँगे। ऐसे पात्र, जिनके पास जीवन के बड़े-बड़े अनुभव हैं, लेकिन वे उन्हें कहते इतने मजेदार ढंग से हैं कि बात दिल में उतर जाती है। ऐसे ही एक दिलचस्प पात्र हैं घुमक्कड़राम। सारी दुनिया यहाँ तक कि बादलों के देश में भी वे घूमते हुए चले जाते हैं। और जब भी वे हमें मिलते हैं, वे या तो कहीं से आ रहे होते हैं या फिर कहीं जा रहे होते हैं। हर वक्त उनके साथ कोई न कोई ऐसा मजेदार किस्सा चल रहा होता है कि सुनो तो तबीयत खुश हो जाती है। बड़ी खूबसूरती से वे अपने आसपास घटी किसी घटना या प्रकृति और पशु-पक्षियों से प्रेम करने के प्रसंग को किसी मजेदार किस्से में ढाल देते हैं। यों पेड़ उगाने और इस धरती की हरियाली को बचाने का सपना वे दूर-दूर तक फैला रहे हैं, क्योंकि पेड़ इस धरती के गहने हैं
प्रकाश मनु सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक। मूल नाम : चंद्रप्रकाश विग। 12 मई, 1950 को शिकोहाबाद (उ.प्र.) में जनमे प्रकाश मनु के लीक से हटकर लिखे गए उपन्यासों 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस', 'पापा के जाने के बाद' की जबरदस्त चर्चा हुई। इसी तरह कहानी और कविताओं का अपना एक अलग रंग। अभी हाल में प्रकाशित आत्मकथा का पहला खंड, 'मैं मनु' तथा 'यादें घर-आँगन की', 'बड़े साहित्यकारों के साथ (संस्मरण) पुस्तकें भी काफी सराही गई। 'यादों का कारवाँ में हिंदी के शीर्ष साहित्यकारों के संस्मरण। साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ । सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी 'देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा' प्रकाशन विभाग से प्रकाशित। बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें, जिन्हें बच्चे ही नहीं, बड़े भी खोज खोजकर पढ़ते और सराहते हैं। हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत् इतिहास 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' लिखा, जो स्वयं में मील के पत्थर सरीखा ऐतिहासिक कार्य है। इसके अलावा 'हिंदी बाल कविता का इतिहास', 'हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व', 'हिंदी बाल साहित्य के निर्माता', 'हिंदी बाल साहित्य मेरे कुछ साक्षात्कार' और 'हिंदी बाल साहित्य संभावनाओं का आकाश पुस्तकें भी। कई महत्त्वपूर्ण संपादित पुस्तकें और संचयन। कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, गुजराती, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद । पुरस्कार : बाल उपन्यास 'एक था ठुनठुनिया' पर साहित्य अकादेमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बाल साहित्य भारती पुरस्कार और हिंदी अकादमी के 'साहित्यकार सम्मान' से सम्मानित। कविता. संकलन 'छूटता हुआ घर' पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार।
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