डॉ० (श्रीमती) गीता कुमारी (25 मई 1960), दर्शनशास्त्र में स्नातक आनर्स व स्नातकोत्तर की शिक्षा पटना विश्वविद्यालय से प्राप्त की हैं। पी-एचडी की उपाधि भी पटना विश्वविद्यालय से ही प्राप्त की हैं। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् एवं बिहार दर्शन परिषद् के आजीवन सदस्य हैं। पिछले करीव अट्ठाईस वर्षों से अधिक अवधि तक बिहार के विभिन्न महाविद्यालय में अध्यापन कार्य से जुड़ी रहीं। जुलाई 1984 से 4 नवम्बर 1996 तक दानापुर स्थित महिला कॉलेज में, 5 नवम्बर 1996 से 18 जुलाई 2002 तक मिथिला विश्वविद्यालय के अंतर्गत मिल्लत कॉलेज में व्याख्याता व सीनियर व्याख्याता के पद पर एवं 19 जुलाई 2002 से 16 अक्टूबर 2008 तक मगध विश्वविद्यालय के अंतर्गत रामलखन सिंह यादव कॉलेज, बख्तियारपुर, पटना में कार्यरत रही। तत्पश्चात् 17 अक्टूबर 2008 से पटना स्थित श्री अरविन्द महिला महाविद्यालय (म.वि.वि.) में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इस पुस्तक के अलावे समाज के विशेषकर श्रमिक/उत्पादक वर्ग की मौलिक समस्याओं का सामाजिक, दार्शनिक, राजनीतिक व विचारधारात्मक आदि-आदि आयामों पर जनवादी व प्रगतिशील पत्रिकाओं में दो दर्जन से अधिक विशिष्ट स्तर के शोध आलेख प्रकाशित हुए । राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय संगोष्ठी व सेमिनार आदि में शोध आलेख के साथ सक्रिय रूप से हिस्सेदारी करती रही। वर्तमान सामाजिक, दार्शनिक, बौद्धिक व सांस्कृतिक आदि समस्याओं के द्वंद्वात्मक विश्लेषण करने में विशेष अभिरूचि रखती है।
इस पुस्तक में विवेकानन्द को एक विनियोजित चैतन्यवादी, अध्यात्मवादी व यथास्थितिवादी संन्यासी के रूप में न दर्शाकर उन्हें एक महान् देशभक्तः विश्व के शोषितों, उपेक्षितों, उत्पीड़ितों एवं दलितों आदि के प्रति अगाध प्रेम करने व सहानुभूति रखने वाला मानवता के महान् अग्रदूत; भारत के परजीवी व उच्च शोषक वर्ग विशेषकर सामंतों के प्रति नफरत व घृणा करनेवाला मेहनतकश जनता के अग्रणी राजनेता; मानव सभ्यता के विशाल महल के निर्माण में श्रमिक वर्ग की भूमिका का अवलोकन करने तथा महत्व देने वाला महान् दार्शनिक; श्रमिक वर्ग का उच्च गर्व, देशभक्ति व सामाजिक बदलाव के लिए इनमें निहित शक्ति व क्षमता को परखनेवाला महान् श्रमिक नेताः मानव इतिहास के अगामी अवस्था में श्रमिक, सर्वहारा व शूद्र को समाज का नेतृत्व व शासक के रूप में देखनेवाला भविष्य द्रष्टाः शूद्र राज्य को एक 'आदर्श राज्य' के रूप में भविष्यवाणी एवं स्वागत करनेवाला अग्रनेता; विश्व एवं औपनिवेशों का साम्राज्यवादियों द्वारा निर्दयतापूर्ण शोषण व निर्लज्जतापूर्वक लूटने के प्रति घृणा व नफरत करनेवाला निरीक्षक के साथ-साथ समभाव एवं विश्वबंधुत्व विचारों के प्रवक्ता व प्रचारक के विश्वनेता आदि-आदि के रूपों में लेखिका द्वारा दर्शाया गया है। आधुनिक भारत में निश्चित तौर पर विवेकानन्द पहला विचारक व दार्शनिक हैं जिन्होंने स्पष्ट रूप से अपने को समाजवादी कहा, क्योंकि उन्होंने अन्य सामाजिक व्यवस्था से इसे श्रेष्ठकर माना । विवेकानन्द का राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का कार्यक्रम की प्रासंगिकता आज भी उतना ही है जितना कि उनके जीवनकाल में था। लेखिका की दृष्टि में विवेकानन्द भारत का हीगल हैं तथा ऐतिहासिक आवश्यकता है एक भारतीय कार्ल मार्क्स के आविर्भाव का ।
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