पुस्तक परिचय
एक खोए हुए आदमी की इस कथा में मनुष्य हैं. उनके सम्बंध हैं, पहाड़ है. हिमालय हैं, समुद्र हैं. रेगिस्तान हैं, किन्तु मनुष्य सब जगह समान हैं. अच्छाई में भी और बुराई में भी। असुरक्षाबोध-ग्रस्त मनुष्य-स्वभाव, रूढ़ परंपराओं और विडंबनापूर्ण परिस्थितियों के बीच अपनी पहचान ढूंढता ढूंढता हुआ वह जब अपने घर पहुंचता है तो एक नये झंझावात में फंस जाता है। अनेक वर्षों के अंतराल को वह मन में अंकित बचपन के उन बिम्बों से भरने की कोशिश करता है, जो वर्तमान की भांति उसके सामने प्रत्यक्ष हो उठते हैं, किंतु वर्तमान का यथार्थ उससे भी विचित्र है। देश की स्वतंत्रता के बाद सुदूर के इन पहाड़ी गांवों तक भी विकास की हवा पहुंची है, जो सुधार और सुविधाओं के साथ कई प्रकार के प्रदूषण भी लाई है। इस बीच काल-प्रवाह ने बहुत कुछ ग्रस लिया है, घने वन, पैदल रास्ते, माता-पिता, मित्र और मनुष्यों का सहज प्रेम तथा विश्वास भी। समुद्र तट के उस पराये मुल्क में उसे हिम्मत भाई जैसा व्यक्ति भी मिला, जिसने बिना नाम-पते के गंगा को सहोदरवत मानकर उसे एक नाम, घर और परिवार सब कुछ दिया। मौत से साथ-साथ जूझते हुए उन दोनों ने जीवन का मर्म जाना था। मौत ते अधिक कठिन होता है अपनों का सामना। उससे भी कठिन है स्वयं अपना सत्यापन करना। अपनों के ही सामने प्रमाण देने की कसौटी, कि मैं 'मैं ही हूं। इतने वर्षों में कितना कुछ बदल गया, एक 'वह' नहीं बदली, किंतु 'वह' भी विवशताओं में जकड़ी हुई है। उसे पहचान कर भी प्रमाणित नहीं कर पाती, पाकर भी नहीं पा नहीं सकती। इतना तो पहले ही समझ चुका था कि वह इस देश का नागरिक नहीं है, वह किसी देश का नागरिक नहीं है, परन्तु अपने घर पहुंच कर यह भी पता चलता है कि वह इस धरती का ही नागरिक नहीं है। तब? युद्ध अनेक विडंबनाओं को जन्म देता है। इस उपन्यासिका में उन विडंबनाओं को भी रेखांकित किया गया है, जिनसे युद्ध में लापता होजाने या वीरगति को प्राप्त होने वाले सैनिकों और उनके परिवारों को जूझना पड़ता है। कोई जीते, कोई हारे उन्हे हमेशा लड़ते ही रहना है।
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