जिस विश्वविद्यालय की अंतःकथा इस उपन्यास में चित्रित है, उसमें साठ हजार विद्यार्थी थे। ये सभी अनिर्णय और कुपथ के अभिशाप में भी पड़े हैं। उनके लिए यदि कोई मार्गदर्शन मिल सके तो यह लेखन सार्थक हो जाएगा। जीवन विष से भरा है। इसका अमृतीकरण ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। प्रत्येक अक्षर एक सागर है, जिसका मंथन होने पर अमृत और विष दोनों के अर्थ-कलश निकलते हैं। जैसा कि समुद्र-मंथन के परिणाम-स्वरूप चौदह रत्न निकले थे। उनमें विष-कलश और अमृत-कलश दोनों थे। जीवन यदि गरल है तो उसका अमृतीकरण ही सागर-मंथन है, क्योंकि जीवन एक यज्ञशाला भी है। 'सागर' में यदि विष का अभिशाप है तो 'लहरी' में अमृतीकरण की आनंद-गंगा भी। हम इनमें किसी एक को छोड़कर जी नहीं सकते। जीवन में इन दोनों का सामंजस्य चाहिए। असमंजस से अंशुमत् को उत्पन्न किया जा सकता है। वह असमंजस सगर का पुत्र और राजा दिलीप का पिता था। सभी वंशधर तपश्चर्या और जिजीविषा के अनुकरणीय उदाहरण हैं। पुराण की इन कथाओं में अनेक प्रतीक और कूटकला भी है, जिनके पटल-प्रति-पटल खोलकर देखने से ही परिमल तथा पराग, सुगंध तथा मकरंद की प्राप्ति हो सकती है। वहीं कंटकों के बीच कमनीय कोमलता तथा रमणीय सौंदर्य के दर्शन हो सकते हैं।
निशांतकेतु मूलतः कवि, कथाकार और तत्त्व-चिंतक हैं। आपने पटना-विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अंतर्गत 37 वर्षों तक अध्यापन किया और अवकाश-ग्रहण के पश्चात् अपने 'शब्दाश्रम' गुड़गाँव में निवास करते हैं। संप्रति आप सुलभ-साहित्य अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष तथा चक्रवाक् के संपादक हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (14018)
Tantra (तन्त्र) (1039)
Vedas (वेद) (731)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2135)
Chaukhamba | चौखंबा (3470)
Jyotish (ज्योतिष) (1632)
Yoga (योग) (1212)
Ramayana (रामायण) (1313)
Gita Press (गीता प्रेस) (716)
Sahitya (साहित्य) (25198)
History (इतिहास) (9344)
Philosophy (दर्शन) (3712)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist