पुस्तक परिचय
उपन्यास में शिक्षा को मानव जीवन की प्रगति के परमाधार के रूप में चित्रण किया गया है। संस्कारित परिवेश का गुरु-शिष्य संबंध व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को आलोकित करने वाला होता है। आधुनिकता की आँधी-तूफान में शिक्षण-जगत में दीमक का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। सफेदपोश में संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। शिक्षा के बढ़ते कदमों में अहं, लोलुपता, अनैतिकता और निरंकुशता के गहराते रंग में शिष्य और गुरु के बढ़ते कदम दिखाई देते हैं। हाय री विडंबना, नायक को सहृदय, चिंतनशील मित्र मिले, ज्ञान-ज्योति जलाने वाले महिमा मंडित गुरु मिले, किंतु उसने भौतिक सुख के लिए, उनका कुछ मनचाहे पलों तक संग रहा। नायक ने शिक्षा जगत के सामान्य विद्यालय से उच्चतम शिक्षा संस्थान विश्वविद्यालय के गरिमामय आचार्य पद पर कार्य किया। इस प्याज की कहानी के लगातार रंगीन छिल्के निकलते रहे और उसकी वास मन-मस्तिष्क को विह्वल करती रही है। उपन्यास में मानवीयता को प्रभावित करने वाले सामाजिक और शैक्षणिक परिवेश के विशेष संदर्भ को सरस कथात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। सहृदय साहित्यकार नरेश मिश्र के उपन्यास में वर्तमान युग के परिवेश में समाज के गाँव से लेकर महानगर तक, प्रारंभिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक के कुछ दृश्य-परिदृश्य प्रस्तुत करने का हृदयस्पर्शी प्रयास है। गाँव स्नेहभरा मधुर पारिवारिक संदर्भहै, तो शिक्षा के केंद्र, आधुनिकता की चकाचौंध महानगरीय परिवेशों में बनते-बिगड़ते पारिवारिक संबंधों, अपने से पराए बनते सामाजिक संबंधों की सिसकी सुनाई देती है। नायक में शब्द जाल का बहुरंगी तंबू है, किंतु अंतःपटल से संस्कार विलुप्त हो चुका है। आचार्य में गौरवमयी गुरुता भले न रही हो, किंतु शिष्य को अपना अंतरंग बनाने की कला, तो थी ही। कमल कीचड़ में खिलता है। शायद नायक इसी मान्यता पर चल कर चरम भौतिक उपलब्धि 'हीरा' को अपना बनाने में 'दलदल' में धँसते ही गए। यह पथ उनका बंधु था, वास्तव में बंध (बाँध) था।
लेखक परिचय
डॉ. नरेश मिश्र शिक्षा: एम.ए. (हिंदी-संस्कृत), पीएच.डी., पोस्ट एम.ए, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (हिंदी) डिप्लोमा, पत्रकारिता डिप्लोमा, साहित्य महोपाध्याय। अध्यापन अनुभव : 43 वर्ष प्रशासनिक अनुभव : अध्यक्ष, हिंदी विभाग (डीन, मानविकी, शिक्षण संकाय) प्रभारी परीक्षा नियंत्रक, प्रभारी कुलपति-हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़। प्रकाशन भाषाविज्ञान : नागरी लिपि और उसकी समस्याएँ, हिंदी शब्द समूह का विकास, अनुप्रयुक्त हिंदी भाषा-चिंतन (पुरस्कृत), भाषा और हिंदी भाषा का इतिहास, भाषाविज्ञान एवं हिंदी भाषा, राम नरेश त्रिपाठी का शब्द भंडार, हिंदी शब्दार्थ की सांस्कृतिक भूमिका, मानक हिंदी व्याकरण, मानक हिंदी और हरियाणावीः व्यतिरेकी अध्ययन, हिंदी मानकीकरणः उच्चारण और लेखन, प्रयोजनमूलक हिंदी, हरियाणावी-हिंदी कोश, हिंदी मानकीकरण और प्रयोग आदि। साहित्य-सृजन: भरोसा करो, इंसान हूँ न!, मिश्र सप्तशती (काव्य), घर से बाहर तक, वातायन (कहानी संग्रह), प्रकाश पर्व, जब पीपल रो पड़ा (लघुकथा संग्रह), महाशिवरात्रि से कार्निवाल तक, स्मृति के मधुर पल (यात्रा-वृत्तांत), स्मृति लतिकाएँ (संस्करण संग्रह), संबंधों की वैतरणी (उपन्यास)। आलोचना आदि: हिंदी साहित्य की भावभूमि, मीडिया लेखन, काव्यांग दर्पण, डॉ. भोला नाथ तिवारी का साहित्य सौरभ, हिंदी काव्य के शिखर भक्तिकालीन संदर्भ, हिंदी काव्य के शिखरः आधुनिक कालीन संदर्भ आदि। संस्कृत: कालिदासीय नाटकेषु सामाजिकं जीवनम् (पुरस्कृत) रचनावली: नरेश मिश्र रचनावली (11 खंड) प्रकाशन सन् 2014 संपर्क: 960, सेक्टर-1, रोहतक (हरियाणा) 124001 मोबाइल नंबर : 9896295552
भूमिका
प्रकृति के सतत परिवर्तन के साथ मानव जीवन में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है, क्योंकि प्रकृति मानव की सहचरी है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। प्रकृति-परिवेश की प्राणवायु जीने का आधार होती है, तो भगवान भास्कर की प्रातःकालीन स्वर्णिम किरणें धरती पर पहुँच कर उठने के लिए जागरण गीत गाती हैं। मनुष्य मां की गोदी में रोना, हँसना और मुस्कराना सीख कर सामाजिक बन जाता है। परिवारिक सहज परिवेश में उसकी अपनी पहचान बनती है और विकास पथ पर चलने का प्रयास करता है। घर से बाहर निकल कर सामाजिक व्यक्तित्व उभरने लगता है। इसके पश्चात संस्कार और चिंतन के आधार पर गति, प्रगति और अवगति के मागों का जाल बिछा दिखाई देता है। वर्तमान वैज्ञानिक युग में तकनीक के आगे सहजता थकी-थकी सी लगती है। स्वार्थ और लोलुपता के प्रभाव में अपनापन क्षीण होता जा रहा है। संबंधों की शीतकालीन गर्मी देने वाली रजाई भी तार-तार हो गई है। मनुष्य की मनुष्यता का रक्त भी पानी हो गया है, तो 'खून के रिश्ते' की चर्चा करना प्रलाप करना ही हो जाएगा। जीवन भर साथ निभाने वाला पवित्र विवाह-बंधन अब दर्द से घिरे रहने के साथ कारागार का बंधन बनता जा रहा है। जीवन में पग-पग पर साथ देने वाले साथी अब स्वाद ले हँस कर विदूषक बनते जा रहे हैं।
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